यह चक्र कोई मौसम तो है नहीं जो अपनी समयानुकूल या कालक्रम के अनुसार समय-समय पर चलेगा । यह चक्र राजनीतिक चक्र भी नहीं है जो हर 5 वर्ष में चल ही जाए । यूँ तो यह शिक्षा क्षेत्र का उच्चतम चक्र है जो विश्वविद्यालयों के लिए नियम बनाता है , पर इसे चलाने वाले अलग अलग किस्म और वेराइटी के लोग होते हैं । वैसे तो यह सरकार के तत्त्वावधान में ही चलाई जाती है किंतु यह उससे इतर है । यह अलग बात है कि हामी शिक्षा क्षेत्र के जानकारों की ही होती है ।यह शिक्षा क्षेत्र की सर्वोत्तम चोटी है फिर भी इससे चक्र धारी को कोई फर्क नहीं पड़ता चक्र चले या न चले । यह हम सभी जानते हैं और मानते भी हैं कि शिक्षा किसी भी देश की नीव होती है जिससे देश का भविष्य निश्चित होता है । एक तरफ तो हम फिर से विश्व गुरु होने की बात करते हैं तो दूसरी ओर अपनी ही परंपरा को इस तरह नस्तोनाबूद कर रहे हैं जिससे देश खोखला होता जा रहा है। इसके कई कारण हैं किन्तु मैं UGC चक्र में ही रहूँगा । आज से सैकड़ो वर्ष पहले जब हम विश्व गुरु थे तो दुनिया ललचायी आँखों से हमारी ओर मुखातिब रहती थी , किंतु आज हम देखा देखी चलते हैं । यह तो एक अलग बात हुई किन्तु सबसे बड़ी बात यह है कि हम अपनी ही चीजों को नस्तोनाबूद करने में मजा ले रहे हैं । देश की हर छोटी बड़ी चीजें राजनीति का हिस्सा बन चुकी है । और यह शायद दशकों से चलता आ रहा होगा तथा वर्षों से इस पर लिखे जाते रहे होंगे । वैसे तो समय समय पर विश्वविद्यालय और विद्यार्थियों के हित को देखते हुए UGC चक्र चलता है , किन्तु हर बार विद्यार्थी का हित हो यह कोई जरूरी नहीं है , यह अलग बात है कि विश्वविद्यालय का हित हो जाए । वैसे तो इसके भी कई पहलू हैं , खैर रहने दीजिए । मैं भी इसे तब समझा जब स्वयं इस चक्र में आ फँसा और सही भी है 'जिस पर बीतता है वही जानता है '। इस तरह न जाने कितने फँसते रहे होंगे और उनकी ज़िन्दगी शुरू होने से पहले खत्म होती रही होगी । शायद ऐसा लगता है यह अनवरत चलता रहेगा ,न जाने कब तक ? क्योंकि देश के सभी स्तम्भ इस पर मौन हैं और यह मात्र अब मजाक रह गया है जिसका इस्तेमाल किसी भी रूप में कर लिया जाता है । यहां तक कि मीडिया को भी इस पर विचार और समीक्षा करने का वक्त नहीं है , क्योंकि इनके लिए भी आरोप प्रत्यारोप मायने रखते हैं और वो बिना किसी प्रयत्न के इन्हें प्राप्त हो जाते हैं । अब जरा UGC चक्र के हाल फिलाल के कारनामों पर आते हैं जिससे मैं आहत हुआ हूँ और आप भी , खैर आपका पता नहीं फिर भी ।जून - जुलाई ,2018 में सरकार ने UGC के साथ बैठक की और यह घोषणा किया कि 2021 से केवल पीएचडी वाले ही कॉलेज प्राध्यापक बन सकेंगे या कहीं- कहीं यह भी खबर मिली कि विश्वविद्यालय प्राध्यापक बनने हेतु यह नियम 2021से लागू होगी । वैसे तो कॉलेज शिक्षकों की बहाली निकलती ही कहां है, और कब है ? यदा- कदा वाली बात अलग है तब तक नेट उत्तीर्ण विद्यार्थी बर्बादी के कगार पर होते हैं । अब जो नियम लाया गया है तो हाल में यानि 2017-2018 में नेट उत्तीर्ण विद्यार्थियों को लगा कि चलो कोई बात नहीं 3 वर्ष तो है इतने में भी पीएचडी की जा सकती है किंतु इसी बीच झारखण्ड तथा दो-एक और राज्यों से विश्वविद्यालय प्राध्यापकों की बहाली निकलती है जिसमें सरकार के साथ UGC द्वारा बनाए गए फिर एक नियम को सौंप दिया जाता है और सभी विश्वविद्यालयों को इसका पालन करने का निर्देश दिया जाता है जिसमें मैट्रिक इंटर के मार्क्स को हटा दिया गया है और ग्रेजुएशन तथा पीजी में 60 से 80% वाले विद्यार्थियों को एक समान अंक देने का प्रावधान है । साथ ही नेट वाले को 5 अंक और पीएचडी वाले को 30 अंक देने का प्रावधान है । इसमें सरकार और UGC 2021 तक के तय समय - सीमा को भूल जाती है और 2018 से ही यह नियम लागू करती है । अब सवाल है कि यह विद्यार्थी कहां जाएं क्या करें इस तरह सैकड़ों सवाल हैं और जवाब केवल मौन है । तय कीजिए क्या भाग्य और क्या दुर्भाग्य है , केवल विद्यार्थियों का नहीं , देश का भी ?
यही हालत विश्वविद्यालयों की भी है वे तो प्राध्यापकों की नियुक्ति कराना ही भूल गए हैं ।यहाँ भी यदा- कदा वाली नियम लागू है प्रक्रिया ऐसी कि यदि बहाली निकल भी गई तो उसे पूरी कराने में कम से कम 5 वर्ष का समय लगता है, उदाहरण स्वरुप बिहार में बीपीएससी द्वारा जो बहाली 2014 में निकाली गई थी उसमें कुछ विषय का रिजल्ट अब तक भी नहीं दिया गया है । अभी हाल में बिहार के विश्वविद्यालयों में अतिथि शिक्षक की बहाली निकल रही है जिसमें बहुत से सीटें खाली हैं तो वहां भी वे स्टूडेंट फॉर्म भर रहे हैं जो बीपीएससी में 2014 में फॉर्म डाले हुए थे ।इस बीच होगा क्या ? यही कि यह लोग भी अतिथि शिक्षक के साक्षात्कार में भाग लेंगे और नियुक्त भी किए जाएंगे किन्तु जैसे ही बीपीएससी रिजल्ट देगी तो उधर फिर नियुक्त हो जाएंगे जिससे फिर सीटें खाली की खाली रह जाएगी और नेट जेआरएफ वाले यहां भी बहुत से बच्चे वंचित रह जाएंगे । विश्वविद्यालयों की हालत ऐसी है कि पीएचडी कराने के लिए भी प्राध्यापक नहीं मिल रहे हैं । विद्यार्थियों का जेआरएफ समाप्त हो रहा, क्योंकि पीएचडी में नामांकन हेतु फॉर्म निकल ही नहीं रही है ,और नेट वाले तो फिर ही रहे हैं मारे मारे । अब कौन तय करेगा ? कौन कौन सुधारेग ? कौन संभालेगा ?आश्चर्य घोर आश्चर्य ?
नोट 👉 ऐसे मुद्दों से ही जुड़ी अमित कुमार मिश्र की 'राम कहानी','बेरोजगारी' जैसी कहानी उनके ब्लॉगkaviamitraju.blogspot.com पर आप पढ़ सकते हैं । आज के नवीन लेखकों में ये काफी सक्रिय हैं ।
यही हालत विश्वविद्यालयों की भी है वे तो प्राध्यापकों की नियुक्ति कराना ही भूल गए हैं ।यहाँ भी यदा- कदा वाली नियम लागू है प्रक्रिया ऐसी कि यदि बहाली निकल भी गई तो उसे पूरी कराने में कम से कम 5 वर्ष का समय लगता है, उदाहरण स्वरुप बिहार में बीपीएससी द्वारा जो बहाली 2014 में निकाली गई थी उसमें कुछ विषय का रिजल्ट अब तक भी नहीं दिया गया है । अभी हाल में बिहार के विश्वविद्यालयों में अतिथि शिक्षक की बहाली निकल रही है जिसमें बहुत से सीटें खाली हैं तो वहां भी वे स्टूडेंट फॉर्म भर रहे हैं जो बीपीएससी में 2014 में फॉर्म डाले हुए थे ।इस बीच होगा क्या ? यही कि यह लोग भी अतिथि शिक्षक के साक्षात्कार में भाग लेंगे और नियुक्त भी किए जाएंगे किन्तु जैसे ही बीपीएससी रिजल्ट देगी तो उधर फिर नियुक्त हो जाएंगे जिससे फिर सीटें खाली की खाली रह जाएगी और नेट जेआरएफ वाले यहां भी बहुत से बच्चे वंचित रह जाएंगे । विश्वविद्यालयों की हालत ऐसी है कि पीएचडी कराने के लिए भी प्राध्यापक नहीं मिल रहे हैं । विद्यार्थियों का जेआरएफ समाप्त हो रहा, क्योंकि पीएचडी में नामांकन हेतु फॉर्म निकल ही नहीं रही है ,और नेट वाले तो फिर ही रहे हैं मारे मारे । अब कौन तय करेगा ? कौन कौन सुधारेग ? कौन संभालेगा ?आश्चर्य घोर आश्चर्य ?
नोट 👉 ऐसे मुद्दों से ही जुड़ी अमित कुमार मिश्र की 'राम कहानी','बेरोजगारी' जैसी कहानी उनके ब्लॉगkaviamitraju.blogspot.com पर आप पढ़ सकते हैं । आज के नवीन लेखकों में ये काफी सक्रिय हैं ।
निश्चय ही यह देश और देश के अनगिनत छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। सही समय पर सही नियम नहीं बनाए जाने का कारण ही है कि बार-बार नियम बदलते रहते हैं और बार-बार के बदलते नियम में सभी एक उलझन की शिकार ही बने हुए हैं। किसी ठोस कदम की सख्त आवश्यकता है।
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