सोमवार, 28 जनवरी 2019

गज़ब तो ये है वो सुन भी नहीं रहा है

हर चेहरे पे चढ़ा इक चेहरा है ,
हर किसी को आईने की जरूरत है ।

वो जो खुद में नहीं है रास्ते आम बता रहा है
गजब तो ये है न वो समझ रहा  है न ये  सुन रहा है

झंझट को बना के पहरा ढूँढता सुकूने ज़िन्दगी है
कोई बताना भी चाहे तो बताए कैसे वो सुनता भी नहीं है

बात इतनी सी है और कयामत किए जा रहा है
सच तो ये है वो खुद पर सितम किए जा रहा है

ये कौन सा दौर है ये कौन सा दयार है
अभी यहां था अभी वहाँ भागे जा रहा है

गजब तो ये है वो सुन  भी  नहीं रहा है ।




शुक्रवार, 11 जनवरी 2019

यही रीत जमाना है (गज़ल)

 आंखों में पानी है
 होठों पे तराना है

 रुकने की चाहत है
 और उस पार भी जाना है

उदास है जिंदगानी
सफर मंजिल का जारी है

जाना मुझको होगा
यही रीत जमाना है ।

मंगलवार, 8 जनवरी 2019

सोमवार, 7 जनवरी 2019

अभिव्यक्ति (कविता)

 मैं जब भी खाली बैठता हूँ
 कुछ बुनता रहता हूँ ।
 अल्हड़ सा हूँ
 चलता रहता हूँ ।

 तुम बताने आए हो मेरी खामोशी,
 बगैर जाने खामोशी की जुबाँ
 जबकि बोल रहा है कुछ न कुछ
 हर बूत हर वस्तु यहाँ ।

रविवार, 6 जनवरी 2019

आदमी (कविता )

 दरअसल !
 हर आदमी एक दलाल है,
 कोई हक का, कोई फ़िक्र का,
 कोई कर्ज का, कोई मुनाफ़ी का ।
 कोई वजूद से लड़ता है ,कोई बेचता  है ।
धन्धों के बाजार में सबका अपना धंधा है
और जिसका  कुछ नहीं है समझो मंदा है ।

शनिवार, 5 जनवरी 2019

उल्फ़त नई नई है (ग़ज़ल )

 वो जो  चांद से मिल रहा है ताप  तुमको
 वो  जो निकल रहा है बन के भाप  तेरा
 बस कह रहा है यही
अभी तो सौदाई नई  नई  है ।

 वो जो  तुम्हारी नयन खिड़कियां
 खामोश लब से कर रही है बातें
बस कह रही है यही
अभी तो असर नई नई है ।

 वो जो  लग रही है फिजाँ नई नई तुमको
 वो जो  धड़क रही है धड़कने  तेरे दिल में उसकी
 बस कह रही है यही
अभी तो उल्फ़त नई  नई है ।

वो जो रतियाँ न  गुजर रही है तेरी
वो जो आंखों के निकल आए हैं डोरे
बस कह रही है यही
अभी तो दीवानगी नई नई  है ।