दरअसल !
हर आदमी एक दलाल है,
कोई हक का, कोई फ़िक्र का,
कोई कर्ज का, कोई मुनाफ़ी का ।
कोई वजूद से लड़ता है ,कोई बेचता है ।
धन्धों के बाजार में सबका अपना धंधा है
और जिसका कुछ नहीं है समझो मंदा है ।
हर आदमी एक दलाल है,
कोई हक का, कोई फ़िक्र का,
कोई कर्ज का, कोई मुनाफ़ी का ।
कोई वजूद से लड़ता है ,कोई बेचता है ।
धन्धों के बाजार में सबका अपना धंधा है
और जिसका कुछ नहीं है समझो मंदा है ।
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