रविवार, 6 जनवरी 2019

आदमी (कविता )

 दरअसल !
 हर आदमी एक दलाल है,
 कोई हक का, कोई फ़िक्र का,
 कोई कर्ज का, कोई मुनाफ़ी का ।
 कोई वजूद से लड़ता है ,कोई बेचता  है ।
धन्धों के बाजार में सबका अपना धंधा है
और जिसका  कुछ नहीं है समझो मंदा है ।

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