सोमवार, 31 दिसंबर 2018

गुजरते हुए वक्त का भ्रम (कविता )

गुजरते हुए वक्त का भ्रम
 या कहूँ आने वाले कल का है जश्न ,
यह तो हमेशा आता है
मगर हममें तुममें कितना आता है ।

यह मान लूँ कैसे ?
तुमने जी ली है ज़िन्दगी ;
वर्ष भर अपनी ।

ज़िन्दगी का वह कौन सा किस्सा तेरा है ,
क्या वाकई कोई सच्चाई है ?
या केवल भ्रम है गुजरते हुए वक्त की तरह ,
जबकि समय अपनी ही चाल से चल रहा है अनवरत
न कभी ज्यादा, न कभी कम ।

बीते हुए कई कालों की तरह चुपचाप गुजर जाएंगे ये ,
और फिर रह जाएगा
 हमारा-तुम्हारा बट्टा ।

गुरुवार, 27 दिसंबर 2018

साहित्य पथिक : सांकृत्यायन


                                                     
    राहुल सांकृत्यायन सच्चे अर्थों में  साहित्य पथिक हैं ।सांकृत्यायन ने  ज्ञान को अपना मार्ग बनाया और निकल पड़े उसे जानने के लिए। सांकृत्यायन की यायावरी साहित्य की अमूल्य निधि है क्योंकि व्यक्ति जब चलना प्रारंभ  करता है तो उसका लक्ष्य भी निर्धारित हो चुका होता है ,मार्ग ही उसे सिखाता ,सँवारता और बनाता  है ।बुद्ध की भाँति वे भी गृह -त्याग कर मानव-समाज हेतु उचित बदलाव की  खोज में निकल पड़े। बाद में वे बौद्ध धर्म स्वीकार कर भिक्षु हो गए इस प्रकार प्रारंभ का केदारनाथ पांडे कालांतर में राहुल सांकृत्यायन के नाम से विख्यात हुआ । उन्होंने मानव जाति में उचित बदलाव हेतु यायावर  की भाँति पर्वतों व  नदियों को पार करते हुए देश विदेश के अर्जित ज्ञान को समझा और उसे मानव समुदाय को समझाने का प्रयास किया। मानव समुदाय को समझाने के पीछे उनका उद्देश्य  था - बदलाव। मानव समुदायों पर उन्होंने कई ग्रंथों का निर्माण भी किया।इस विषय पर विचार करते हुए वे लिखते हैं - " 'विश्व की  रूपरेखा', 'मानव-समाज', 'दर्शन-दिग्दर्शन'और ' वैज्ञानिक भौतिकवाद' - चारों पुस्तकें मानव-जाति के आज तक के अर्जित ज्ञान को संक्षेप में कहने  की कोशिश कर रही हैं  किंतु उनका ज्ञान सिर्फ विश्व को जानने के लिए नहीं ,बल्कि उसे  'बदलने के लिए' है ।"[1] अपने यायावरी के दौरान उन्होंन कई ऐसे ग्रंथों की खोज की जो साहित्य व मानवीय जगत को समृद्ध करने में सहायक सिद्ध हुआ। अपने अन्वेषी क्षमता के द्वारा उन्होंने इसके पटल को विस्तृत किया ।यायावरी के दौरान ही उन्हें कई भाषाओं को जानने व समझने का मौका मिला। यही वजह थी कि राहुल सांकृत्यायन तकरीबन 36 भाषाओं के ज्ञाता थे। जहाँ तक उनके हिन्दी प्रेम की बात है तो इस क्षेत्र में उन्होंने कई महत्वपूर्ण कार्य किए ।उनके द्वारा जुटाए गए ग्रंथों की वजह से ही हिंदी साहित्य आज इतनी समृद्ध हो सकी है। खासकर हिंदी साहित्य  के आदिकाल में सिद्धों-नाथों  की जो परंपरा देखने को मिलती है वह राहुल सांकृत्यायन की ही देन है। इसे हिंदी साहित्य के सबसे मूर्धन्य आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भी स्वीकारा है- "...त्रिपिटकाचार्य राहुल सांकृत्यायन भोट  देश में जाकर सिद्धों की और बहुत सी रचनाएँ लाये ।"[2] यह राहुल सांकृत्यायन का अथक प्रयास ही है जिसके कारण साहित्य की विशालता का यह परिदृश्य  आज हम देख  रहे हैं। यायावर सांकृत्यायन का समग्र जीवन रचनाधर्मिता की यात्रा थी वे जहाँ भी गए वहाँ के लोगों से घुलमिल कर  उनकी भाषा व बोलियाँ सिखी जिससे वे वहाँ की संस्कृति तथा साहित्य की गूढ़ता का  अध्ययन कर सके । वे देश विदेश के कोने-कोने से दुर्लभ ग्रंथ एकत्रित कर भारत लाए  जिसकी विशालता के रूप में हमें साहित्य की यह धरोहर मिली है ।सांकृत्यायन के ग्रंथों की संख्या लगभग 140 मानी जाती है ।उन्होंने साहित्य के कई विधाओं में सृजन किया है  जैसे  -उपन्यास, संस्मरण, जीवनी, आत्मकथा, कहानी, निबंध आदि जिसमें की उनकी अधिकतर रचनाएं हिंदी में  ही हैं। यायावर सांकृत्यायन के करीब 20 पुस्तकें ऐसे हैं जो केवल  उनकी यात्राओं से संबंधित  हैं। उनके यात्रा वृतांतों में - 'मेरी तिब्बत यात्रा'(1937 ), 'मेरी लद्दाख यात्रा'( 1939), ' किन्नर देश में '( 1948), ' घुमक्कड़ शास्त्र '( 1948), ' राहुल यात्रावली'( 1949 )आदि प्रमुख हैं।उपन्यासों   में 'बाइसवीं सदी'( 1923 ), 'सिंह  सेनापति'( 1942),  'जययौधेय'( 1944), 'दिवोदास'( 1961) आदि के स्थान आते हैं  हैं ।इनमें से 'बाइसवीं सदी' का अपना विशेष महत्व है ,इस उपन्यास की रचना उन्होंने हजारीबाग जेल में रहते  हुए  दूरद्रष्टा की भाँति की  है । इसके अलावे उनके अन्य उपन्यास ऐतिहासिक हैं ।ऐतिहासिक उपन्यासों के संदर्भ में सांकृत्यायन के अपने विचार हैं-" मेरे लिए किसी एक ही काल  पर राजा-रजवाड़े की जीवनी का बहुत-सा चित्रण, ऐतिहासिक उपन्यास नहीं है ।यह तो इतिहास-रस या ऐतिहासिक-रोमांस है ।  ऐतिहासिक उपन्यास लिखने के लिए मैं सामग्री एकत्र करता हूँ ।इतिहास, समाजशास्त्र और नृतत्वशास्त्र से फिर मुझे अपनी ऐतिहासिक स्थापना के लिए कथानक मिलता है ।इस आधार पर मैं उपन्यास की कल्पना करता हूँ ।[3]

                      राजनीति में भी राहुल सांकृत्यायन की सक्रिय भूमिका रही है। उन्होंने जनता की समस्या हेतु कलम का उपयोग हथियार के रुप में  किया ।बिहार के राजनीतिक संघर्ष  में उनकी अहम भूमिका देखने  को मिलती है  ।सन् 1940 में बिहार के किसानों द्वारा किए गए आंदोलन में उन्होंने  हिस्सा लिया   और उसकी अध्यक्षता भी की ।वे  जमींदारों के आतंक की परवाह किए  बगैर सत्याग्रहियों  के साथ हँसिया  लेकर खेतों में उतर पड़े । इस पर  जमींदार के लठैतों ने  उनपर लाठियां बरसाई ।इस किसान आंदोलन में उन्हें  एक वर्ष की जेल हो गई ।जेल प्रवास के  दौरान ही उन्होने  'दर्शन -दिग्दर्शन ' नामक ग्रंथ की रचना की।सन् 1942 की बात है जब राहुल सांकृत्यायन भारत छोड़ो आंदोलन के पश्चात जेल से निकले तो उसी समय किसान आंदोलन के शीर्ष  नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती द्वारा प्रकाशित पत्रिका 'हुंकार'  का उन्हें संपादक बनाया गया  ।    " ब्रिटिश सरकार ने फूट डालो और राज करो की नीति अपनाते हुए गैर कांग्रेसी पत्र-पत्रिकाओं में चार अंकों हेतु 'गुण्डों से लड़िए'शीषर्क से एक विज्ञापन जारी किया । इसमें एक व्यक्ति गाँधी  टोपी व जवाहर बण्डी पहने आग लगाता हुआ दिखाया गया था  । राहुल सांकृत्यायन ने इस विज्ञापन को छापने से इंकार कर दिया पर विज्ञापन की मोटी धनराशि देखकर स्वामी सहजानंद ने इसे छापने पर जोर दिया । अंततः राहुल ने अपने को पत्रिका के सम्पादन कार्य से अलग कर लिया ।"  [4] राहुल सांकृत्यायन  ने अपनी तटस्थ विचार-धारा के साथ किसी रूप में समझौता नहीं किया ,क्योंकि वे बाहरी क्रांति से कहीं ज्यादा मानसिक क्रांति को महत्त्व देते   थे । उनकी एक लेख है  'दिमागी ग़ुलामी' जिसमें वे लिखते हैं - "हमें अपनी मानसिक दासता की बेड़ी की एक-एक कड़ी को बेदर्दी के साथ  तोड़कर फेंकने  के लिए तैयार होना चाहिए। बाहरी क्रांति से कहीं ज्यादा जरूरत मानसिक क्रांति की  है ।"[5]

                    साहित्य पथिक राहुल सांकृत्यायन  जैसे महान साहित्यधर्मी पर जब भी हम विचार करते हैं तो यही निष्कर्ष पाते हैं कि उन्होंने जिस क्षेत्र में भी अपने विचारों को गति दी वह पूरी स्पष्टता  के साथ और जो भी  निर्णय लिया पूरी तटस्थता के साथ, बात  चाहे साहित्यिक हो या राजनीतिक अथवा उनके जीवन की ।

   संदर्भ ग्रंथ -
[1].राहुल सांकृत्यायन ,'मानव-समाज' लोकभारती प्रकाशन ,प्राक्कथन से ।
[2].आचार्य रामचंद्र शुक्ल ,'हिन्दी साहित्य का इतिहास' अनुपम प्रकाशन - 2011,पृ.-4.
[3].आजकल(साहित्यिक पत्रिका -दिल्ली ),अप्रैल -2018,पृ.-21.
[4].अभिनव क़दम-1,अंक:16-17,(राहुल सांकृत्यायन:स्वप्न और संघर्ष ),पृ.-218-219
[5].आजकल  (साहित्यिक पत्रिका -    दिल्ली),अप्रैल-2018,पृ.-28

                                     
                

शनिवार, 22 दिसंबर 2018

UGC चक्र

      यह चक्र कोई मौसम तो है नहीं जो अपनी समयानुकूल या कालक्रम के अनुसार समय-समय पर चलेगा । यह चक्र राजनीतिक चक्र भी नहीं है जो हर 5 वर्ष  में चल ही जाए । यूँ तो यह शिक्षा क्षेत्र का उच्चतम चक्र है जो विश्वविद्यालयों के लिए नियम बनाता है , पर इसे चलाने वाले अलग अलग किस्म और वेराइटी के लोग होते  हैं । वैसे तो यह सरकार के तत्त्वावधान में ही चलाई जाती  है किंतु यह उससे इतर है । यह अलग बात है कि हामी  शिक्षा क्षेत्र के जानकारों की ही होती है ।यह शिक्षा क्षेत्र की सर्वोत्तम चोटी है फिर भी इससे चक्र धारी को कोई फर्क नहीं पड़ता चक्र चले या न चले । यह हम सभी जानते हैं और मानते भी हैं कि शिक्षा किसी भी देश की नीव होती है जिससे देश का भविष्य निश्चित होता है । एक तरफ तो हम फिर से  विश्व गुरु होने की बात करते हैं तो दूसरी ओर अपनी ही परंपरा को इस तरह नस्तोनाबूद कर रहे  हैं जिससे देश खोखला होता जा रहा है। इसके कई कारण हैं किन्तु मैं UGC चक्र में ही रहूँगा । आज से सैकड़ो वर्ष पहले  जब हम विश्व गुरु थे तो दुनिया ललचायी आँखों  से हमारी ओर मुखातिब रहती थी , किंतु आज हम देखा देखी चलते हैं । यह तो एक अलग बात हुई किन्तु सबसे बड़ी बात यह है कि हम अपनी ही चीजों को नस्तोनाबूद करने में मजा ले रहे हैं । देश की हर छोटी बड़ी चीजें राजनीति का हिस्सा बन चुकी है । और यह शायद दशकों  से चलता आ रहा होगा तथा वर्षों से इस पर लिखे जाते रहे होंगे । वैसे तो समय समय पर विश्वविद्यालय और विद्यार्थियों के हित को देखते हुए UGC चक्र चलता है , किन्तु हर बार विद्यार्थी का हित हो यह कोई जरूरी नहीं है , यह अलग बात है कि विश्वविद्यालय का हित हो जाए । वैसे तो इसके भी कई पहलू हैं , खैर रहने दीजिए । मैं भी इसे तब समझा जब स्वयं इस चक्र में आ फँसा और सही भी है 'जिस पर बीतता है वही जानता है '। इस तरह न जाने कितने फँसते रहे होंगे और उनकी ज़िन्दगी शुरू होने से पहले खत्म होती रही होगी । शायद ऐसा लगता है यह अनवरत चलता रहेगा ,न जाने कब तक ?  क्योंकि देश के सभी स्तम्भ इस पर मौन हैं और यह मात्र अब मजाक रह गया है जिसका इस्तेमाल किसी भी  रूप में कर लिया जाता है । यहां तक कि मीडिया को भी इस पर विचार और समीक्षा करने का वक्त नहीं है , क्योंकि इनके लिए भी आरोप प्रत्यारोप मायने रखते हैं और वो  बिना किसी प्रयत्न के इन्हें प्राप्त हो जाते हैं । अब जरा UGC चक्र के हाल फिलाल के कारनामों पर आते हैं जिससे मैं आहत हुआ हूँ और आप भी , खैर आपका पता नहीं फिर भी ।जून - जुलाई ,2018 में सरकार ने UGC के साथ बैठक की और यह घोषणा किया कि 2021 से केवल पीएचडी वाले ही कॉलेज प्राध्यापक बन सकेंगे या कहीं- कहीं यह भी खबर मिली कि  विश्वविद्यालय प्राध्यापक बनने हेतु यह नियम 2021से लागू होगी । वैसे तो कॉलेज शिक्षकों की बहाली निकलती ही कहां है, और कब है ? यदा- कदा वाली  बात अलग है तब तक नेट उत्तीर्ण विद्यार्थी बर्बादी के कगार पर होते हैं । अब जो नियम लाया गया है तो हाल में यानि 2017-2018 में नेट उत्तीर्ण विद्यार्थियों को लगा कि चलो कोई बात नहीं 3 वर्ष तो है इतने में भी पीएचडी की जा सकती है किंतु इसी बीच झारखण्ड  तथा दो-एक और राज्यों से विश्वविद्यालय प्राध्यापकों की बहाली निकलती है जिसमें सरकार के साथ UGC द्वारा बनाए गए फिर एक नियम को सौंप दिया जाता है और सभी विश्वविद्यालयों को इसका पालन करने का निर्देश दिया जाता है जिसमें मैट्रिक इंटर के मार्क्स  को हटा दिया गया है और ग्रेजुएशन तथा पीजी में 60 से 80% वाले विद्यार्थियों को एक समान अंक देने का प्रावधान है । साथ ही नेट वाले को 5 अंक और पीएचडी वाले को 30 अंक देने का प्रावधान है । इसमें सरकार और UGC 2021 तक के तय समय - सीमा को  भूल जाती है और 2018 से ही यह नियम लागू करती है । अब सवाल है कि यह विद्यार्थी कहां जाएं क्या करें इस तरह सैकड़ों सवाल हैं और जवाब केवल मौन है । तय  कीजिए क्या भाग्य और क्या दुर्भाग्य है , केवल विद्यार्थियों का नहीं , देश का भी ?

           यही हालत विश्वविद्यालयों की भी है वे  तो प्राध्यापकों की  नियुक्ति कराना ही भूल गए हैं ।यहाँ भी यदा- कदा वाली नियम लागू है प्रक्रिया ऐसी कि यदि बहाली निकल भी गई तो उसे पूरी कराने में कम से कम 5 वर्ष का समय लगता है, उदाहरण स्वरुप बिहार में बीपीएससी द्वारा जो बहाली 2014 में निकाली गई थी उसमें कुछ विषय का रिजल्ट अब तक भी नहीं दिया गया है । अभी हाल में बिहार के विश्वविद्यालयों में अतिथि शिक्षक की बहाली निकल रही है जिसमें बहुत से सीटें खाली हैं तो वहां भी वे  स्टूडेंट फॉर्म भर रहे हैं जो बीपीएससी में 2014 में फॉर्म डाले हुए थे ।इस बीच होगा क्या  ? यही कि यह लोग भी अतिथि शिक्षक के साक्षात्कार में भाग लेंगे और नियुक्त भी किए जाएंगे किन्तु जैसे ही बीपीएससी रिजल्ट देगी तो उधर फिर  नियुक्त हो जाएंगे जिससे फिर सीटें खाली की खाली रह जाएगी और नेट जेआरएफ वाले यहां भी बहुत से बच्चे वंचित रह जाएंगे । विश्वविद्यालयों की हालत ऐसी है कि  पीएचडी कराने के लिए भी प्राध्यापक नहीं  मिल रहे हैं । विद्यार्थियों का जेआरएफ समाप्त हो रहा, क्योंकि पीएचडी में नामांकन हेतु फॉर्म निकल ही नहीं रही   है ,और नेट वाले तो फिर ही रहे हैं मारे मारे  ।  अब कौन तय करेगा ? कौन कौन सुधारेग ? कौन संभालेगा ?आश्चर्य घोर आश्चर्य ?


नोट 👉 ऐसे मुद्दों से ही जुड़ी अमित कुमार मिश्र की 'राम कहानी','बेरोजगारी' जैसी कहानी उनके ब्लॉगkaviamitraju.blogspot.com पर आप पढ़ सकते हैं । आज के नवीन लेखकों में ये काफी सक्रिय हैं ।

मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

क्यूँ इंसां इतना बेख़बर हो रहा है (ग़ज़ल)

फ़क़त हवाओं की ये आदतें अब अच्छी नहीं लगती ,
 तोड़ देना किसी की फुनगियाँ और कच्चे फलों का बिखर   जाना ।

दरख्तों के घावों से वो बेख़बर हो रहा है ,
जैसे बेख़बर हैं बच्चे अपने बुजुर्गों से ।

अच्छी नहीं लगती हवाएँ अब शहरों की ,
दम घुटने लगा है मेरा ,मेरी ही कारस्तानी से ।

फ़क़त इल्जाम किसी पर लगाना ,
खुद को बचाने का इक बहाना है ,

 ये जो हवाएँ खुश्क हो  गयी है ,
दोषी हम भी हैं तुम भी हो ।

यह देखकर तंग है शिव
कि इल्जाम कोई मौसमें बहार पर लगा रहा है ,

गुनाह की जड़ों को वो कितनी मजबूत कर रहा है
क्यूँ इंसां इतना बेख़बर हो रहा है ।


नोट 👉   इस ग़ज़ल के एक पहलू को मेरे कवि व कथाकार मित्र 'अमित' ने बड़े सुन्दर तरीके से रखा है ।इसे आप उनके ब्लॉगkaviamitraju.blogspot.com पर देख सकते हैं ।आज  के दौर में वे अपनी काव्य - कुशलता और कथा लेखन में अलग पहचान रखते हैं ।

वक्त (कविता )

वक्त की भी अजीब अठखेलियाँ है ,

जिस पल भी सोचो -

आधा भूत है , आधा भविष्य है  ।

दुःख का घनावरण , सुख का अतिशय ,

जीवन के हैं बस दो ही मौसम ।

मिला जो तुम्हे तुम न समझ सके

- गया क्या - आएगा क्या - बस उसी में लगे रहे ।



सोमवार, 17 दिसंबर 2018

बात (कविता )

बात! जो शब्दों से हो रही है ,
         परेशानियाँ कम सी गयी हैं ।
वक्त की थपकियों को -
        पूरी पूरी सुनता हूँ ।
बहुत कुछ करना चाहता हूँ ,
       बहुत कुछ चलता रहता है ।
बंद हो गयी है भागा दौड़ी,
      मगर और ज्यादा चलता हूँ ।
अक्सर जागता रहता हूँ ,
      कुछ बुनता रहता हूँ ।
शब्द मुझसे और मैं शब्दों से-
       बातें करता ही रहता हूँ ।