सोमवार, 31 दिसंबर 2018

गुजरते हुए वक्त का भ्रम (कविता )

गुजरते हुए वक्त का भ्रम
 या कहूँ आने वाले कल का है जश्न ,
यह तो हमेशा आता है
मगर हममें तुममें कितना आता है ।

यह मान लूँ कैसे ?
तुमने जी ली है ज़िन्दगी ;
वर्ष भर अपनी ।

ज़िन्दगी का वह कौन सा किस्सा तेरा है ,
क्या वाकई कोई सच्चाई है ?
या केवल भ्रम है गुजरते हुए वक्त की तरह ,
जबकि समय अपनी ही चाल से चल रहा है अनवरत
न कभी ज्यादा, न कभी कम ।

बीते हुए कई कालों की तरह चुपचाप गुजर जाएंगे ये ,
और फिर रह जाएगा
 हमारा-तुम्हारा बट्टा ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपने लिखा है ‘यह कैसे मान लूं तुमने जी ली है जिंदगी अपनी, वर्षभर।’ यह कदाचित संभव नहीं है कि हमने अपनी जिंदगी को समुचित रूप से जिया है। हम मनुष्य का स्वभाव है कि, हम आने वाले कल की चिंता में अपने आज तो गवाते चले जाते हैं। यह वैसे ही है कि हाथ में आइसक्रीम रखे हैं और उसे बाद में खाने के लिए संजोए फिर रहे हैं। इस बात को भूल बैठते हैं की बाद के लिए आइसक्रीम बचेगा ही नहीं वह तो अपने समय से पिघलता जाएगा।
    भाव तथा कथ्य में उम्दा प्रयोग किया है आपने। कभी आप के मंतव्य को और गहराई से समझने का प्रयास करूंगा।

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