मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

क्यूँ इंसां इतना बेख़बर हो रहा है (ग़ज़ल)

फ़क़त हवाओं की ये आदतें अब अच्छी नहीं लगती ,
 तोड़ देना किसी की फुनगियाँ और कच्चे फलों का बिखर   जाना ।

दरख्तों के घावों से वो बेख़बर हो रहा है ,
जैसे बेख़बर हैं बच्चे अपने बुजुर्गों से ।

अच्छी नहीं लगती हवाएँ अब शहरों की ,
दम घुटने लगा है मेरा ,मेरी ही कारस्तानी से ।

फ़क़त इल्जाम किसी पर लगाना ,
खुद को बचाने का इक बहाना है ,

 ये जो हवाएँ खुश्क हो  गयी है ,
दोषी हम भी हैं तुम भी हो ।

यह देखकर तंग है शिव
कि इल्जाम कोई मौसमें बहार पर लगा रहा है ,

गुनाह की जड़ों को वो कितनी मजबूत कर रहा है
क्यूँ इंसां इतना बेख़बर हो रहा है ।


नोट 👉   इस ग़ज़ल के एक पहलू को मेरे कवि व कथाकार मित्र 'अमित' ने बड़े सुन्दर तरीके से रखा है ।इसे आप उनके ब्लॉगkaviamitraju.blogspot.com पर देख सकते हैं ।आज  के दौर में वे अपनी काव्य - कुशलता और कथा लेखन में अलग पहचान रखते हैं ।

1 टिप्पणी:

  1. जिस दुनिया में इंसान जी रहा है और अपने लिए जिस तरह का माहौल पैदा कर रहा है, बड़ा जरूरी है कि आज का कवि समाज को जागरूक करे। आपका कार्य सराहनीय है।

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