गुरुवार, 27 दिसंबर 2018

साहित्य पथिक : सांकृत्यायन


                                                     
    राहुल सांकृत्यायन सच्चे अर्थों में  साहित्य पथिक हैं ।सांकृत्यायन ने  ज्ञान को अपना मार्ग बनाया और निकल पड़े उसे जानने के लिए। सांकृत्यायन की यायावरी साहित्य की अमूल्य निधि है क्योंकि व्यक्ति जब चलना प्रारंभ  करता है तो उसका लक्ष्य भी निर्धारित हो चुका होता है ,मार्ग ही उसे सिखाता ,सँवारता और बनाता  है ।बुद्ध की भाँति वे भी गृह -त्याग कर मानव-समाज हेतु उचित बदलाव की  खोज में निकल पड़े। बाद में वे बौद्ध धर्म स्वीकार कर भिक्षु हो गए इस प्रकार प्रारंभ का केदारनाथ पांडे कालांतर में राहुल सांकृत्यायन के नाम से विख्यात हुआ । उन्होंने मानव जाति में उचित बदलाव हेतु यायावर  की भाँति पर्वतों व  नदियों को पार करते हुए देश विदेश के अर्जित ज्ञान को समझा और उसे मानव समुदाय को समझाने का प्रयास किया। मानव समुदाय को समझाने के पीछे उनका उद्देश्य  था - बदलाव। मानव समुदायों पर उन्होंने कई ग्रंथों का निर्माण भी किया।इस विषय पर विचार करते हुए वे लिखते हैं - " 'विश्व की  रूपरेखा', 'मानव-समाज', 'दर्शन-दिग्दर्शन'और ' वैज्ञानिक भौतिकवाद' - चारों पुस्तकें मानव-जाति के आज तक के अर्जित ज्ञान को संक्षेप में कहने  की कोशिश कर रही हैं  किंतु उनका ज्ञान सिर्फ विश्व को जानने के लिए नहीं ,बल्कि उसे  'बदलने के लिए' है ।"[1] अपने यायावरी के दौरान उन्होंन कई ऐसे ग्रंथों की खोज की जो साहित्य व मानवीय जगत को समृद्ध करने में सहायक सिद्ध हुआ। अपने अन्वेषी क्षमता के द्वारा उन्होंने इसके पटल को विस्तृत किया ।यायावरी के दौरान ही उन्हें कई भाषाओं को जानने व समझने का मौका मिला। यही वजह थी कि राहुल सांकृत्यायन तकरीबन 36 भाषाओं के ज्ञाता थे। जहाँ तक उनके हिन्दी प्रेम की बात है तो इस क्षेत्र में उन्होंने कई महत्वपूर्ण कार्य किए ।उनके द्वारा जुटाए गए ग्रंथों की वजह से ही हिंदी साहित्य आज इतनी समृद्ध हो सकी है। खासकर हिंदी साहित्य  के आदिकाल में सिद्धों-नाथों  की जो परंपरा देखने को मिलती है वह राहुल सांकृत्यायन की ही देन है। इसे हिंदी साहित्य के सबसे मूर्धन्य आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भी स्वीकारा है- "...त्रिपिटकाचार्य राहुल सांकृत्यायन भोट  देश में जाकर सिद्धों की और बहुत सी रचनाएँ लाये ।"[2] यह राहुल सांकृत्यायन का अथक प्रयास ही है जिसके कारण साहित्य की विशालता का यह परिदृश्य  आज हम देख  रहे हैं। यायावर सांकृत्यायन का समग्र जीवन रचनाधर्मिता की यात्रा थी वे जहाँ भी गए वहाँ के लोगों से घुलमिल कर  उनकी भाषा व बोलियाँ सिखी जिससे वे वहाँ की संस्कृति तथा साहित्य की गूढ़ता का  अध्ययन कर सके । वे देश विदेश के कोने-कोने से दुर्लभ ग्रंथ एकत्रित कर भारत लाए  जिसकी विशालता के रूप में हमें साहित्य की यह धरोहर मिली है ।सांकृत्यायन के ग्रंथों की संख्या लगभग 140 मानी जाती है ।उन्होंने साहित्य के कई विधाओं में सृजन किया है  जैसे  -उपन्यास, संस्मरण, जीवनी, आत्मकथा, कहानी, निबंध आदि जिसमें की उनकी अधिकतर रचनाएं हिंदी में  ही हैं। यायावर सांकृत्यायन के करीब 20 पुस्तकें ऐसे हैं जो केवल  उनकी यात्राओं से संबंधित  हैं। उनके यात्रा वृतांतों में - 'मेरी तिब्बत यात्रा'(1937 ), 'मेरी लद्दाख यात्रा'( 1939), ' किन्नर देश में '( 1948), ' घुमक्कड़ शास्त्र '( 1948), ' राहुल यात्रावली'( 1949 )आदि प्रमुख हैं।उपन्यासों   में 'बाइसवीं सदी'( 1923 ), 'सिंह  सेनापति'( 1942),  'जययौधेय'( 1944), 'दिवोदास'( 1961) आदि के स्थान आते हैं  हैं ।इनमें से 'बाइसवीं सदी' का अपना विशेष महत्व है ,इस उपन्यास की रचना उन्होंने हजारीबाग जेल में रहते  हुए  दूरद्रष्टा की भाँति की  है । इसके अलावे उनके अन्य उपन्यास ऐतिहासिक हैं ।ऐतिहासिक उपन्यासों के संदर्भ में सांकृत्यायन के अपने विचार हैं-" मेरे लिए किसी एक ही काल  पर राजा-रजवाड़े की जीवनी का बहुत-सा चित्रण, ऐतिहासिक उपन्यास नहीं है ।यह तो इतिहास-रस या ऐतिहासिक-रोमांस है ।  ऐतिहासिक उपन्यास लिखने के लिए मैं सामग्री एकत्र करता हूँ ।इतिहास, समाजशास्त्र और नृतत्वशास्त्र से फिर मुझे अपनी ऐतिहासिक स्थापना के लिए कथानक मिलता है ।इस आधार पर मैं उपन्यास की कल्पना करता हूँ ।[3]

                      राजनीति में भी राहुल सांकृत्यायन की सक्रिय भूमिका रही है। उन्होंने जनता की समस्या हेतु कलम का उपयोग हथियार के रुप में  किया ।बिहार के राजनीतिक संघर्ष  में उनकी अहम भूमिका देखने  को मिलती है  ।सन् 1940 में बिहार के किसानों द्वारा किए गए आंदोलन में उन्होंने  हिस्सा लिया   और उसकी अध्यक्षता भी की ।वे  जमींदारों के आतंक की परवाह किए  बगैर सत्याग्रहियों  के साथ हँसिया  लेकर खेतों में उतर पड़े । इस पर  जमींदार के लठैतों ने  उनपर लाठियां बरसाई ।इस किसान आंदोलन में उन्हें  एक वर्ष की जेल हो गई ।जेल प्रवास के  दौरान ही उन्होने  'दर्शन -दिग्दर्शन ' नामक ग्रंथ की रचना की।सन् 1942 की बात है जब राहुल सांकृत्यायन भारत छोड़ो आंदोलन के पश्चात जेल से निकले तो उसी समय किसान आंदोलन के शीर्ष  नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती द्वारा प्रकाशित पत्रिका 'हुंकार'  का उन्हें संपादक बनाया गया  ।    " ब्रिटिश सरकार ने फूट डालो और राज करो की नीति अपनाते हुए गैर कांग्रेसी पत्र-पत्रिकाओं में चार अंकों हेतु 'गुण्डों से लड़िए'शीषर्क से एक विज्ञापन जारी किया । इसमें एक व्यक्ति गाँधी  टोपी व जवाहर बण्डी पहने आग लगाता हुआ दिखाया गया था  । राहुल सांकृत्यायन ने इस विज्ञापन को छापने से इंकार कर दिया पर विज्ञापन की मोटी धनराशि देखकर स्वामी सहजानंद ने इसे छापने पर जोर दिया । अंततः राहुल ने अपने को पत्रिका के सम्पादन कार्य से अलग कर लिया ।"  [4] राहुल सांकृत्यायन  ने अपनी तटस्थ विचार-धारा के साथ किसी रूप में समझौता नहीं किया ,क्योंकि वे बाहरी क्रांति से कहीं ज्यादा मानसिक क्रांति को महत्त्व देते   थे । उनकी एक लेख है  'दिमागी ग़ुलामी' जिसमें वे लिखते हैं - "हमें अपनी मानसिक दासता की बेड़ी की एक-एक कड़ी को बेदर्दी के साथ  तोड़कर फेंकने  के लिए तैयार होना चाहिए। बाहरी क्रांति से कहीं ज्यादा जरूरत मानसिक क्रांति की  है ।"[5]

                    साहित्य पथिक राहुल सांकृत्यायन  जैसे महान साहित्यधर्मी पर जब भी हम विचार करते हैं तो यही निष्कर्ष पाते हैं कि उन्होंने जिस क्षेत्र में भी अपने विचारों को गति दी वह पूरी स्पष्टता  के साथ और जो भी  निर्णय लिया पूरी तटस्थता के साथ, बात  चाहे साहित्यिक हो या राजनीतिक अथवा उनके जीवन की ।

   संदर्भ ग्रंथ -
[1].राहुल सांकृत्यायन ,'मानव-समाज' लोकभारती प्रकाशन ,प्राक्कथन से ।
[2].आचार्य रामचंद्र शुक्ल ,'हिन्दी साहित्य का इतिहास' अनुपम प्रकाशन - 2011,पृ.-4.
[3].आजकल(साहित्यिक पत्रिका -दिल्ली ),अप्रैल -2018,पृ.-21.
[4].अभिनव क़दम-1,अंक:16-17,(राहुल सांकृत्यायन:स्वप्न और संघर्ष ),पृ.-218-219
[5].आजकल  (साहित्यिक पत्रिका -    दिल्ली),अप्रैल-2018,पृ.-28

                                     
                

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