'यात्री' के नाम से मशहूर नागार्जुन की कविता में सामाजिक यथार्थ भरा पड़ा है। वे समाज को प्रगतिशील विचारधारा से जुड़कर देखते हैं । उन्होंने सामाजिक यथार्थ को जैसा देखा वैसा कहा, जितना देखा उतना कहा। वे सिर्फ सामाजिक पहलू पर कविता ही नहीं करते बल्कि उसके साथ खुद को तटस्थ भी रखते हैं । 'प्रतिबद्ध हूँ ' नामक कविता में नागार्जुन लिखते हैं -
प्रतिबद्ध हूँ , जी हाँ ,प्रतिबद्ध हूँ -
वहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त -
- - -
प्रतिबद्ध हूँ , जी हाँ , शतधा प्रतिबद्ध हूँ !
नागार्जुन के यथार्थ चित्रण में अधिक विविधता और प्रौढ़ता है 'अकाल और उसके बाद ' नामक कविता में कवि ने जनता को गौण रखते हुए मूलतः उसी की स्थिति का वर्णन किया है ।कविता के पहले भाग में वे अकाल से उत्पन्न समस्याओं का वर्णन करते हैं तथा दूसरे भाग में अकाल के बाद का चित्रण -
कई दिनों तक चूल्हा रोया , चक्की रही उदास
- - -
दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
नागार्जुन यथार्थ के चित्रण को लेकर इतने गंभीर हैं कि वे वीभत्स संदर्भों को भी अपनी साहसिक कल्पना के द्वारा कविता में बांधते हैं । डॉक्टर नामवर सिंह लिखते हैं - "नागार्जुन ऐसे पहले कवि हैं जिन्होंने सामाजिक राजनीतिक संदर्भ में भी वीभत्स को नई शक्ति प्रदान की है ।" -
फैल गया है दिव्य मूत्र का लवण सरोवर
सामाजिक जीवन की कविता लिखते हुए नागार्जुन अपनी पहुंच व्यक्ति परिवार और समाज से लेकर व्यवस्था तक रखते हैं । सन् 1961 के आजाद हिंदुस्तान में जब ब्रिटेन की रानी एलिजाबेथ आ रही थी तो तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उनके स्वागत की भरपूर व्यवस्था की थी जो कई भारतवासियों को रास नहीं आया , जिस अंग्रेजी हुकूमत को लाखों कुर्बानियों के बाद देश से भगाया गया था उसी साम्राज्य के महारानी की स्वागत में ऐसी व्यवस्था ? इस असंतोष को नागार्जुन ने अपनी कविता 'आओ रानी ,हम ढोएंगे पालकी' में बड़ी ही कठोरता से व्यक्त किया है -
आओ रानी , हम ढोएंगे पालकी ,
यही हुई है राय जवाहरलाल की ।
नागार्जुन की कविता जनता की मन:स्थिति का प्रतिनिधित्व करती है । व्यक्तिगत गरीबी का विस्तार करोड़ों जनता में देखकर उनकी बेचैनी और बढ़ती है। उन्होंने सामाजिक यथार्थ को व्यक्त करने के लिए नई उपमाएँ, नए बिंब-प्रतीकभी समाज से लिए -
कैसे लिखूँ शान्ति पर कविता
अमन चैन को कैसे कड़ियों में बाधूं !!
मैं दरिद्र हूँ
पुश्त पुश्त की यह दरिद्रता
कटहल के छिलके - जैसी चीभ से मेरा लहू चाटती आई !
तात्कालिक घटनाओं पर कविता करने की नागार्जुन की विलक्षण दृष्टि अतुलनीय है । इस पर विचार करते हुए केदारनाथ सिंह लिखते हैं - " तात्कालिक विषय पर कविता लिखना एक खतरनाक काम है। यह खतरा केवल सामाजिक या राजनीति का स्तर पर नहीं होता बल्कि स्वयं कविता के स्तर पर भी होता है। पर नागार्जुन एक रचनाकार की पूरी जिम्मेवारी के साथ इस खतरे का सामना करते हैं और इस दृष्टि से देखें तो उनमें खतरनाक ढंग से कभी होने का अद्भुत साहस है ।" 'हरिजन गाथा ' तात्कालिक घटनाओं से जुड़ी एक प्रसिद्ध कविता है जिसमें तेरह- तेरह मनु पुत्रों को ऊंची जातियों के सौ-सौ मनु पुत्रों द्वारा प्रचंड अग्नि में झोंक दिया गया है -
ऐसा तो कभी नहीं हुआ था कि
एक नहीं , दो नहीं , तीन नहीं -
तेरह के तेरह अभागे -
अकिंचन मनुपुत्र
जिन्दा झोंक दिए गए हों
प्रचण्ड अग्नि की विकराल लपटों में
साधन-सम्पन्न ऊँची जातियों वाले
सौ-सौ मनुपुत्रों द्वारा !
ऐसा तो कभी नहीं हुआ था ...
बाबा नागार्जुन इस देश की जनता को सुखी देखना चाहते हैं इसलिए उन्होंने किसी पंथ से परहेज नहीं किया । उनका मानना था कि जिस भी तरह से इस देश के गरीब को रोटी मिल जाए वह जायज है इसलिए कई बार वह सर्वत्र सशस्त्र क्रांति और नक्सलवाद की विचारधारा के साथ खड़े नजर आते हैं । वे कहते हैं गरीब के लिए रोटी किसी भी विचारधारा से आए वही मेरी विचारधारा है। मुझे जहां भी इसकी उम्मीद दिखी मैंने उनका समर्थन किया लेकिन सब ने मेरा मन खराब किया। आज भी यदि कोई नवयुवक आ जाए और गरीब की रोटी का इंतजाम कर दे तो मैं तो उसके साथ ही चल पड़ूंगा।
नागार्जुन कविता के रूप और शिल्प में कई प्रयोग किए हैं ।वे लगातार मुक्त छंद के साथ छंदोबद्ध कविताएं भी लिखते रहें हैं ।खासतौर से उनके आंदोलनधर्मी कविताएं छंदों में ही हैं ।ऐसे अवसरों पर उन्होंने सहज और लोक प्रचलित छंदों का उपयोग किया है ।
प्रतिबद्ध हूँ , जी हाँ ,प्रतिबद्ध हूँ -
वहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त -
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प्रतिबद्ध हूँ , जी हाँ , शतधा प्रतिबद्ध हूँ !
नागार्जुन के यथार्थ चित्रण में अधिक विविधता और प्रौढ़ता है 'अकाल और उसके बाद ' नामक कविता में कवि ने जनता को गौण रखते हुए मूलतः उसी की स्थिति का वर्णन किया है ।कविता के पहले भाग में वे अकाल से उत्पन्न समस्याओं का वर्णन करते हैं तथा दूसरे भाग में अकाल के बाद का चित्रण -
कई दिनों तक चूल्हा रोया , चक्की रही उदास
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दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
नागार्जुन यथार्थ के चित्रण को लेकर इतने गंभीर हैं कि वे वीभत्स संदर्भों को भी अपनी साहसिक कल्पना के द्वारा कविता में बांधते हैं । डॉक्टर नामवर सिंह लिखते हैं - "नागार्जुन ऐसे पहले कवि हैं जिन्होंने सामाजिक राजनीतिक संदर्भ में भी वीभत्स को नई शक्ति प्रदान की है ।" -
फैल गया है दिव्य मूत्र का लवण सरोवर
सामाजिक जीवन की कविता लिखते हुए नागार्जुन अपनी पहुंच व्यक्ति परिवार और समाज से लेकर व्यवस्था तक रखते हैं । सन् 1961 के आजाद हिंदुस्तान में जब ब्रिटेन की रानी एलिजाबेथ आ रही थी तो तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उनके स्वागत की भरपूर व्यवस्था की थी जो कई भारतवासियों को रास नहीं आया , जिस अंग्रेजी हुकूमत को लाखों कुर्बानियों के बाद देश से भगाया गया था उसी साम्राज्य के महारानी की स्वागत में ऐसी व्यवस्था ? इस असंतोष को नागार्जुन ने अपनी कविता 'आओ रानी ,हम ढोएंगे पालकी' में बड़ी ही कठोरता से व्यक्त किया है -
आओ रानी , हम ढोएंगे पालकी ,
यही हुई है राय जवाहरलाल की ।
नागार्जुन की कविता जनता की मन:स्थिति का प्रतिनिधित्व करती है । व्यक्तिगत गरीबी का विस्तार करोड़ों जनता में देखकर उनकी बेचैनी और बढ़ती है। उन्होंने सामाजिक यथार्थ को व्यक्त करने के लिए नई उपमाएँ, नए बिंब-प्रतीकभी समाज से लिए -
कैसे लिखूँ शान्ति पर कविता
अमन चैन को कैसे कड़ियों में बाधूं !!
मैं दरिद्र हूँ
पुश्त पुश्त की यह दरिद्रता
कटहल के छिलके - जैसी चीभ से मेरा लहू चाटती आई !
तात्कालिक घटनाओं पर कविता करने की नागार्जुन की विलक्षण दृष्टि अतुलनीय है । इस पर विचार करते हुए केदारनाथ सिंह लिखते हैं - " तात्कालिक विषय पर कविता लिखना एक खतरनाक काम है। यह खतरा केवल सामाजिक या राजनीति का स्तर पर नहीं होता बल्कि स्वयं कविता के स्तर पर भी होता है। पर नागार्जुन एक रचनाकार की पूरी जिम्मेवारी के साथ इस खतरे का सामना करते हैं और इस दृष्टि से देखें तो उनमें खतरनाक ढंग से कभी होने का अद्भुत साहस है ।" 'हरिजन गाथा ' तात्कालिक घटनाओं से जुड़ी एक प्रसिद्ध कविता है जिसमें तेरह- तेरह मनु पुत्रों को ऊंची जातियों के सौ-सौ मनु पुत्रों द्वारा प्रचंड अग्नि में झोंक दिया गया है -
ऐसा तो कभी नहीं हुआ था कि
एक नहीं , दो नहीं , तीन नहीं -
तेरह के तेरह अभागे -
अकिंचन मनुपुत्र
जिन्दा झोंक दिए गए हों
प्रचण्ड अग्नि की विकराल लपटों में
साधन-सम्पन्न ऊँची जातियों वाले
सौ-सौ मनुपुत्रों द्वारा !
ऐसा तो कभी नहीं हुआ था ...
बाबा नागार्जुन इस देश की जनता को सुखी देखना चाहते हैं इसलिए उन्होंने किसी पंथ से परहेज नहीं किया । उनका मानना था कि जिस भी तरह से इस देश के गरीब को रोटी मिल जाए वह जायज है इसलिए कई बार वह सर्वत्र सशस्त्र क्रांति और नक्सलवाद की विचारधारा के साथ खड़े नजर आते हैं । वे कहते हैं गरीब के लिए रोटी किसी भी विचारधारा से आए वही मेरी विचारधारा है। मुझे जहां भी इसकी उम्मीद दिखी मैंने उनका समर्थन किया लेकिन सब ने मेरा मन खराब किया। आज भी यदि कोई नवयुवक आ जाए और गरीब की रोटी का इंतजाम कर दे तो मैं तो उसके साथ ही चल पड़ूंगा।
नागार्जुन कविता के रूप और शिल्प में कई प्रयोग किए हैं ।वे लगातार मुक्त छंद के साथ छंदोबद्ध कविताएं भी लिखते रहें हैं ।खासतौर से उनके आंदोलनधर्मी कविताएं छंदों में ही हैं ।ऐसे अवसरों पर उन्होंने सहज और लोक प्रचलित छंदों का उपयोग किया है ।
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