1. नागार्जुन सामाजिक यथार्थ के कवि हैं उन्होंने सामाजिक यथार्थ को जैसे देखा वैसे कहा, जितना देखा उतना कहा ।
2. सामाजिक यथार्थता में उन्होंने अपनी भागीदारी दर्शाते हुए अपनी प्रतिबद्धता को भी रेखांकित किया है 'प्रतिबद्ध हूं 'नामक कविता में वे लिखते हैं-
प्रतिबद्ध हूँ , जी हाँ प्रतिबद्ध हूँ -
बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त
- - -
प्रतिबद्ध हूँ , जी हाँ , शतधा प्रतिबद्ध हूँ ।
3. नागार्जुन यथार्थ के चित्रण को लेकर इतने गंभीर हैं कि वे वीभत्स संदर्भों को भी अपनी साहसिक कल्पना के द्वारा कविता में बाँधते हैं-
' फैल गया है दिव्य मूत्र का लवण सरोवर '
4.नागार्जुन की यथार्थता पर विचार करते हुए डॉक्टर नामवर सिंह ने लिखा है - "नागार्जुन ऐसे पहले कवि हैं जिन्होंने सामाजिक राजनीतिक संदर्भ में वीभत्स को नई शक्ति प्रदान की है ।"
5.बाबा नागार्जुन को गरीबों की चिंता सदैव सताती रहती थी और इसका निजात वे नवयुवकों के नेतृत्व में देखते थे इसलिए वे कहा करते थे- "यदि कोई नवयुवक आ जाए और गरीब की रोटी का इंतजाम कर दे कर दे तो ,मैं उसके साथ ही चल पड़ूंगा ।
2. सामाजिक यथार्थता में उन्होंने अपनी भागीदारी दर्शाते हुए अपनी प्रतिबद्धता को भी रेखांकित किया है 'प्रतिबद्ध हूं 'नामक कविता में वे लिखते हैं-
प्रतिबद्ध हूँ , जी हाँ प्रतिबद्ध हूँ -
बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त
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प्रतिबद्ध हूँ , जी हाँ , शतधा प्रतिबद्ध हूँ ।
3. नागार्जुन यथार्थ के चित्रण को लेकर इतने गंभीर हैं कि वे वीभत्स संदर्भों को भी अपनी साहसिक कल्पना के द्वारा कविता में बाँधते हैं-
' फैल गया है दिव्य मूत्र का लवण सरोवर '
4.नागार्जुन की यथार्थता पर विचार करते हुए डॉक्टर नामवर सिंह ने लिखा है - "नागार्जुन ऐसे पहले कवि हैं जिन्होंने सामाजिक राजनीतिक संदर्भ में वीभत्स को नई शक्ति प्रदान की है ।"
5.बाबा नागार्जुन को गरीबों की चिंता सदैव सताती रहती थी और इसका निजात वे नवयुवकों के नेतृत्व में देखते थे इसलिए वे कहा करते थे- "यदि कोई नवयुवक आ जाए और गरीब की रोटी का इंतजाम कर दे कर दे तो ,मैं उसके साथ ही चल पड़ूंगा ।
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