रविवार, 21 अप्रैल 2019

 मेरे अंतस में विचारों के आवागमन का रफ्तार बढ़ गया है
 भावों का मार्च जारी है
 और इस दौरान इसका संपर्क कई विचारों से हुआ
  कुछ ने टोका, कुछ ने डांटा, कुछ ने चेताया ...

फिर मैंने  समझा
 जुबाँ पे  लगाम का अर्थ है
 शब्दों को तमीज की नसीहत देना
 वर्ना रौंदे  कुचले जा सकते हैं
 एक ही जंग में बंदूक और कलम के सिपाही

इस कदर मेरा अंतस मुझे बताता है
 कि सवालों और जवाबों का एक निर्धारित लक्ष्य है
 जहां  पहुँचकर वे मिट  जाते  हैं ,
तब कौतूहल के साथ विचारों का मरना एक स्वाभाविक क्रिया जान पड़ता है ।

1 टिप्पणी:

  1. वाह, आज के टूटते समय में एक बेजोड़ कविता से साक्षात्कार मन को सुकून देती है।
    शब्दों को तमीज देने की बनावटी नाटक का अच्छा मंचन किया है आपने।

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