सोमवार, 7 जनवरी 2019

अभिव्यक्ति (कविता)

 मैं जब भी खाली बैठता हूँ
 कुछ बुनता रहता हूँ ।
 अल्हड़ सा हूँ
 चलता रहता हूँ ।

 तुम बताने आए हो मेरी खामोशी,
 बगैर जाने खामोशी की जुबाँ
 जबकि बोल रहा है कुछ न कुछ
 हर बूत हर वस्तु यहाँ ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. मैं अपनी एक पंक्ति प्रेषित करता हूं आपकी कविता के आलोक में-
    ‘अधरें अकंपित हैं तो रहें,
    कोई बात नहीं,
    हम बात अधरों से नहीं
    निगाहों से किया करते हैं।’

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