मैं जब भी खाली बैठता हूँ
कुछ बुनता रहता हूँ ।
अल्हड़ सा हूँ
चलता रहता हूँ ।
तुम बताने आए हो मेरी खामोशी,
बगैर जाने खामोशी की जुबाँ
जबकि बोल रहा है कुछ न कुछ
हर बूत हर वस्तु यहाँ ।
कुछ बुनता रहता हूँ ।
अल्हड़ सा हूँ
चलता रहता हूँ ।
तुम बताने आए हो मेरी खामोशी,
बगैर जाने खामोशी की जुबाँ
जबकि बोल रहा है कुछ न कुछ
हर बूत हर वस्तु यहाँ ।
मैं अपनी एक पंक्ति प्रेषित करता हूं आपकी कविता के आलोक में-
जवाब देंहटाएं‘अधरें अकंपित हैं तो रहें,
कोई बात नहीं,
हम बात अधरों से नहीं
निगाहों से किया करते हैं।’
😇बहुत बढियाँ।👍
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